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Faridabad NCR

अमृता हॉस्पिटल में चल रहे ए.एम.आर नैक्स्ट 2025 में नेशनल और ग्लोबल एक्सपर्ट्स ने बढ़ते ड्रग रज़िस्टैंस के खतरे से निपटने का आह्वान किया

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Faridabad Hindustanabtak.com/Dinesh Bhardwaj : 29 नवंबर। अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद में ए.एम.आर नैक्स्ट 2025 – ‘‘ट्रांसफॉर्मेटिव स्ट्रेट्जीज़ टू टैकल एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस फॉर ए सेफर टुमॉरो’’ (सुरक्षित भविष्य के लिए एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस से निपटने की रणनीति) विषय पर एक दो दिवसीय सम्मेलन चल रहा है। तेजी से बढ़ते एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस (ए.एम.आर) द्वारा दशकों की मेडिकल प्रगति को उत्पन्न हो रहे खतरे से निपटने के लिए इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन 29 और 30 नवंबर, 2025 को किया गया है, जिसमें सरकार, जनस्वास्थ्य, शिक्षा जगत, बायोटेक्नोलॉजी और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के दिग्गज हिस्सा ले रहे हैं। इस सम्मेलन का उद्देश्य मनुष्यों, जीव-जंतुओं और पर्यावरण को स्वस्थ रखने के लिए भारत में नीति निर्माण, निगरानी और इनोवेशन में तेजी लाना है।
भारत बैक्टीरियल संक्रमण के सबसे अधिक भार वाले देशों में शामिल है। नेशनल ए.एम.आर सर्वियलेंस के आँकड़ों में ई.कोली, क्लेबसियेला निमोनिए, स्टेफीलोकोकस ऑरियस और एसिनेटोबैक्टर बॉमानी जैसे पैथोजंस में चिंताजनक रज़िस्टैंस देखने में आया है।
आईसीएमआर के नए आँकड़ों के मुताबिक ई.कोली के खिलाफ सेफ्टाज़िडाईम की प्रभावशीलता में कुछ सुधार (साल 2023 में 19.2 प्रतिशत से साल 2024 में 27.5 प्रतिशत) हुआ है, लेकिन कार्बापेनेम्स और कोलिस्टिन के प्रति बढ़ता रज़िस्टैंस खतरे का संकेत है, जिसके कारण इलाज के विकल्प घट रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में बढ़ते ए.एम.आर के अनेक कारण हैंः
• संक्रामक बीमारियों का अत्यधिक भार
• मनुष्यों और जानवरों को अत्यधिक और अनुचित रूप से एंटीबायोटिक दिया जाना।
• एंटीबायोटिक ओटीसी काउंटर पर उपलब्ध होना।
• डायग्नोस्टिक का अपर्याप्त सुपरविज़न।
• फार्मास्युटिकल कचरे और हॉस्पिटल के कचरे से जल स्रोतों का गंदा होना।
अगर ए.एम.आर ऐसे ही बढ़ता रहा, तो मरीजों को लंबे समय तक हॉस्पिटल में रुकना पड़ेगा, इलाज की लागत बढ़ जाएगी और उत्पादकता का नुकसान होगा, जिससे अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा।
इस सम्मेलन में वरिष्ठ नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, ग्लोबल ए.एम.आर एक्सपर्ट्स और इनोवेटर्स ने हिस्सा लिया है, जो वन हैल्थ फ्रेमवर्क पर आधारित समाधानों पर बातचीत करेंगे। मुख्य सत्रों में निम्नलिखित विषयों पर बात होनी है:
• डायग्नोस्टिक और एंटीमाईक्रोबियल सुपरविज़न में अत्याधुनिक प्रगति
• नए थेरेपिक्टिस के लिए इनोवेशन की पाईपलाईन
• पर्यावरण और कृषि के पहलू से ए.एम.आर
• लैबोरेटरी नेटवर्क को मजबूत बनाना
• नीतियों में तालमेल और क्रॉस-बॉर्डर सहयोग
यहाँ पर विकसित होती हुई टेक्नोलॉजी के साथ डिजिटल हैल्थ, तीव्र डायग्नोस्टिक, एंटीमाईक्रोबियल ऑप्टिमाईज़ेशन और संक्रमण से बचाव की रणनीतियों का प्रदर्शन भी किया जा रहा है।
भारत सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने कहा, ‘‘भारत में एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस से निपटना कितना जरूरी है, इसका हमें एहसास है, इसीलिए हमने वन हैल्थ के सिद्धांतों के साथ एक नेशनल एक्शन प्लान बनाया है। हमने लैबोरेटरी की क्षमता बढ़ाई है, परीक्षण की विधियों को मानक बनाया है और मानव, जीवजंतुओं एवं पर्यावरण की निगरानी के प्लेटफॉर्म्स को आपस में जोड़ा है। इसके माध्यम से हमें ट्रेंड्स को पहचानने और तीव्र प्रतिक्रिया देने में मदद मिली है, तथा हम डब्लूएचओ के ग्लोबल सर्वियलेंस सिस्टम में डेटा का योगदान देने में समर्थ बने हैं।’’
डॉ. संजीव सिंह, मेडिकल डायरेक्टर, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद ने कहा, ‘‘एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस का हैल्थ सिस्टम पर गहरा असर हो रहा है। मरीजों की मृत्युदर बढ़ रही है, उन्हें लंबे समय तक हॉस्पिटल में रुकना पड़ रहा है और उनके इलाज की लागत बढ़ रही है। इस चुनौती का सामना कोई भी संस्थान या देश अकेले नहीं कर सकता है। इससे निपटने के लिए हमें मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को साथ रखकर सहयोग, क्रॉस-बॉर्डर अनुसंधान और तालमेल के साथ कार्रवाई करने की गंभीर जरूरत है।
प्रोफेसर एलिसन होम्स ओबीई, सेंटर्स फॉर एंटीमाइक्रोबियल ऑप्टिमाइजेशन नेटवर्क की लीड और इंपीरियल कॉलेज लंदन में फ्लेमिंग इनिशिएटिव की डायरेक्टर ने कहा कि, “एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस हम सभी के लिए बहुत बड़ा खतरा है, फिर चाहे हमारी सीमाएं या आर्थिक स्थिति कोई भी क्यों न हो। ए.एम.आर के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत, तालमेलपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रयास बहुत आवश्यक है।”
यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल में इन्फेक्शियस डिज़ीज़ और ग्लोबल हेल्थ के इवांस चेयर, डेविड प्राइस ने कहा, “यह केवल सहयोग के माध्यम से हो सकता है। हमें खुशी है कि एंटीमाईक्रोबियल रज़िस्टैंस से निपटने के प्रयासों में हमें अमृता विश्व विद्यापीठम के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला है। हम एंटीमाईक्रोबियल उपयोग में सुधार लाने और इनोवेटिव रणनीतियों के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
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